
एकदा हि विशालायां चत्वार ऋषयोऽमलाः ।
सत्संङ्गार्थ समायाता ददृशुस्तत्र नारदम् ॥ ( भा.मा. 1/25 )
एक समय
की बात है विशालापुरी ( बद्रीनारायणधाम ) में सनकादि चारों भाई सत्संग की इच्छा से
विचरण कर रहे थे क्योंकि ध्यान , भजन
, पूजन , आदि तो सब एकान्त में हो सकता है । पर सत्संग का एकान्त में थोड़े -
ही आनन्द आता है । तो चारों भैया विचरण कर रहे थे कि अचानक नारदजी को देखा ।
नारदजी को देखकर बहुत प्रसन्न हो गये । संत को जब कोई भगवद्रसिक संत मिलता है , तो बड़े प्रसन्न हो जाते हैं कि आज कुछ
भगवतचर्चा होगी । और सनकादियों का तो जीवन ही भगवत्कथा है ' कथामात्रैक जीविनः ' । पर जैसे ही नारदजी के निकट आये तो
बड़ा आश्चर्य हुआ ? क्योंकि नारदजी का मुख बहुत चिन्तित
नज़र आया ।
सनकादिक आश्चर्यचकित हो गये कि समाज की चिन्ताओं
को दूर करने वाले परमसंत श्रीनारदजी चिन्तातुर है ? बड़ा आश्चर्य है ? पूछा
,
कथं ब्रह्मन्दीनमुखः कुतश्चिन्तातुरो भवान् ।
त्वरितं गम्यते कुत्र कुतश्चागमनं तव ॥
इदानीं शून्यचित्तोऽसि गतवित्तो यथा जनः
तवेदं मुक्तसंङ्गस्य नोचितं वद कारणम् ॥
भो
ब्रह्मन् ! कथं दीनमुखः ?
'. ( भा.मा. 1 / 26-27 )
अरे
नारदजी महाराज ! आपका मुख इस प्रकार से लटका हुआ क्यों है ? किस बात की चिन्ता आपको सता रही है ? यह भागे - भागे कहाँ से आ रहे हो , कहाँ जा रहे हो ? आपका मुखकमल तो ऐसे लग रहा है , जैसे कोई महाकृपण का धन चला गया हो ? ' गतवित्तो यथा जनः ' तुम्हारा क्या चला गया ? क्योंकि जो धन छीन लिया जाये , संत - महापुरुष ऐसे धन को अपना समझते
ही नहीं । और संतों का जो अपना धन है , उसे
संसार में कोई चुराने वाला नहीं है । और महात्माओं का धन क्या है ? वृन्दावन में जाकर देखिए , कीर्तन - हमारो धन राधा श्रीराधा
श्रीराधा प्रभु का नाम ही संतों का तो एक परमधन है , जिसे संसार में कोई चुराने वाला नहीं जिसकी कोई किसी प्रकार की चिंता
करने की आवश्यकता नहीं । फिर नारदजी ! तुम तो ऐसे वीतराग और मुक्तसंग हो कि दुनिया
में अपने लिये एक झोपड़ी तक नहीं बनायी कहीं , क्योंकि
दो घड़ी से ज्यादा कहीं टिकते नहीं । तो रमते - राम होकर भी इस प्रकार मुँह लटकाये
क्यों घूम रहे हो ? संसारियों को जब समस्यायें सताती हैं , तो संतो की शरण में पाने के लिए आते
हैं । और सन्त ही यदि इस प्रकार से चिन्ता में मुँह लटकाये दिखेंगे , तो संसारियों पर बीतेगी , ' नोचितं वद कारणम् ' । आप - जैसे विरक्त संतों को इस प्रकार
चिन्ता करना उचित नहीं है ,
हमें दु : ख का कारण बताइये । तब
नारदजी ने अपने चारों अग्रजों को प्रणाम करते हुए अपनी समस्या सामने रखी कि भैया !
मैं अपनी समस्या आपको सुनाता हूँ । मैं इस संसार में सत्संग की इच्छा से घूम रहा
था कि भगवद्रसिकों के बीच बैठकर कुछ भगवच्चर्चा करूँगा और सुनूँगा । इस संसार में
मैं सर्वत्र घूमा और मैंने सारे तीर्थों में परिभ्रमण कर लिया कहीं मुझे सत्संग का
आनन्द नहीं मिला । कोई भी तीर्थ नहीं छोड़ा ।
पुष्करं च प्रयागं च काशीं गोदावरी तथा ।।
हरिक्षेत्रं कुरुक्षेत्रं श्रीरङ्ग सेतुबन्धनम् ।
एवमादिषु तीर्थेषु भ्रममाण
इतस्ततः ॥ ( भा.मा. 1 /
28-29 )
जब
समस्त भूमण्डल में मेरे चित्त को शान्ति नहीं मिली , तो मैंने सोचा कि चलो अब संतों के पास चला जाये । सम्भवतया संतों के
यहां शान्ति मिले ? पर मैंने क्या देखा कि ' पाखण्डनिरताः सन्तः ' सन्त भी पाखण्ड - परायण होते चले जा
रहे हैं । पाखण्ड का अर्थ है ' पापस्य
खण्डः पाखण्डः ' । पाप का ही जो खण्ड हो उसका नाम पाखण्ड है । उनकी परिभाषायें
बदल गईं हैं - ' यह बंगला किसका है ? त्यागीजी महाराज ' यह बच्चे किसके हैं ? ब्रह्मचारीजी महाराज के ' , ' इतना शोर - हल्ला कहाँ सुनाई पड़ रहा
है ? मौनी बाबाजी के आश्रम में ' - ऐसी बड़ी विचित्र स्थिति है ।
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