
शनि महाराज जी की दृष्टि के कारण कटा था भगवान श्री गणेश जी का शीश
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक बार भोलेनाथ जी के परम प्रिय शिष्य शनि महाराज जी कैलाश पर्वत पर आये उस समय भोलेनाथ ध्याना मग्न थे शनि महाराज भोले बाबा को ध्यान मग्न देखकर माता पार्वती जी के दर्शन के लिए गये वहां जगत माता पार्वती अपने पुत्र गणेश को गोद में लेकर बैठी थी, शास्त्र पुराणों के अनुसार भगवान गणेश जी का मुख अति सुंदर और तेजमयी था, गणेश जी के दर्शन करते ही सारे कष्ट दुख दूर हो जाते थे।
शनि महाराज भगवान गणेश जी के सुंदर मुख की ओर ना देखकर अपनी आंखें नीचे के हुए थे और माता पार्वती जी से बात करने लगे जब मां पार्वती ने देखा कि शनि महाराज मेरे पुत्र गणेश को नहीं देख रहे हैं वह अपनी निगाहें नीचे किए हुए हैं तब जगत माता पार्वती ने शनि महाराज जी से पूछ लिया की आप किसी को भी क्यों नहीं देख रहे हैं?
शनि महाराज जी ने कारण बताते हुए कहा कि मुझे मेरी पत्नी ने श्राप दिया है कि वह जिस किसी को भी देखेंगे उसका सिर धड़ से अलग हो जाएगा, माता पार्वती ने पूछा कि आपकी पत्नी ने ऐसा श्राप क्यों दिया तब शनि महाराज जी कहने लगे कि जगत माता मैं लगातार भगवान शिवजी के ध्यान में मग्न रहता हूं एक बार की बात है जब मैं ध्यान में बैठा था और मेरी पत्नी ऋतुकालीन से निवृत्त होकर मेरे समीप आई लेकिन मैं भगवान भोलेनाथ के ध्यान में मग्न था इस कारण में अपनी पत्नी की ओर नहीं देख सका तब मेरी पत्नी ने इस अपमान के बदले में मुझे शराब दे दिया कि तुम जिस की ओर देखोगे उसका सिर धड़ से अलग हो जाएगा यह बात सुनकर जगत माता पार्वती ने कहा कि आप मेरे पुत्र गणेश के ओर देखिए उसके मुख का तेज समस्त कष्टों को हर लेता है शनि महाराज भगवान गणेश पर दृष्टि डालना नहीं चाहते थे किंतु माता पार्वती के आदेश की अवहेलना भी नहीं कर सकते इसलिए शनि महाराज जी ने तिरछी निगाह से गणेश की और जैसे ही देखा उसी समय शनि देव की दृष्टि पढ़ते ही भगवान गणेश जी का सिर धड़ से कटकर नीचे गिर गया तब भगवान विष्णु ने हाथी के बच्चे का सिर गणेश जी के सिर पर स्थापित कर उन्हें पुनः जीवित कर दिया।
आचार्य दिनेश पाण्डेय (मुम्बई & उत्तराखण्ड)
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